Jaleel Allahabadi

Jaleel Allahabadi

@jaleel-allahabadi

📍 Allahabad· India

Jaleel Allahabadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jaleel Allahabadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

नहीं हो तुम तो हर शय अजनबी मा'लूम होती है बहार-ए-ज़िंदगी काँटों भरी मा'लूम होती है चराग़-ए-ज़ीस्त की लौ थरथराती है चले आओ मुझे हर साँस अपनी आख़िरी मा'लूम होती है बताऊँ क्या तुम्हारी चश्म-ए-उल्फ़त की असर-रेज़ी रग-ओ-पै में उतरती बर्क़ सी मा'लूम होती है सितम मुझ पर उसी अंदाज़ से पैहम किए जाओ तुम्हारी दुश्मनी भी दोस्ती मा'लूम होती है जहाँ देखा किसी ने भी हमें चश्म-ए-मोहब्बत से पलट कर ज़िंदगी आई हुई मा'लूम होती है तवाफ़-ए-दैर-ओ-का'बास यही हासिल हुआ मुझ को मोहब्बत ही सरापा बंदगी मा'लूम होती है 'जलील' इक शम-ए-हसरत बुझ गई तो ग़म नहीं इस का अभी दाग़-ए-जिगर में रौशनी मा'लूम होती है — Jaleel Allahabadi
चराग़-ए-इश्क़ जलता है हमारे क़ल्ब-ए-वीराँ में चले आओ अभी तक रौशनी है इस बयाबाँ में नहीं ऐ दोस्त इन अश्कों का कोई देखने वाला दरख़्शाँ हैं जो अंजुम की तरह चाक-ए-गरेबाँ में कुछ ऐसे ग़म भी होते हैं जो अश्कों में नहीं ढलते शरारे बन के लेकिन रक़्स करते हैं रग-ए-जाँ में बनाना था जिसे मंसूर उसे दार-ओ-रसन बख़्शा उसे यूसुफ़ बनाते हैं जिसे रखते हैं ज़िंदाँ में वो कश्ती आज डूबा चाहती है पास साहिल के सलामत एक मुद्दत तक रही जो बहर-ए-तूफ़ाँ में ज़माने में फ़क़त एक बेबसी का साथ होता है कोई अपना नहीं होता कभी हाल-ए-परेशाँ में — Jaleel Allahabadi
मिरा अनीस मिरा ग़म है तुम न साथ चलो तुम्हारा और ही आलम है तुम न साथ चलो अजब तज़ाद का मौसम है तुम न साथ चलो छुपाए शो'लों को शबनम है तुम न साथ चलो ख़ुशी तो ग़र्क़-ए-ग़म-ए-रोज़गार है मेरी लब-ए-हयात पे मातम है तुम न साथ चलो हर एक मोड़ पे जलते हैं ग़ुर्बतों के चराग़ क़दम क़दम पे नया ग़म है तुम न साथ चलो ज़मीन ख़ून उगलती है चर्ख़ अंगारे निज़ाम-ए-दहर भी बरहम है तुम न साथ चलो अभी जली तो है तहज़ीब-ए-नौ की शम्अ' मगर अभी ये रौशनी मद्धम है तुम न साथ चलो जिगर के ख़ूँ से बनाया है मैं ने सुर्ख़ जिसे वो मेरे हाथ में परचम है तुम न साथ चलो अभी बनाने हैं आईन दार-ओ-ज़िन्दाँ के ये फ़र्ज़ हम पे मुक़द्दम है तुम न साथ चलो हर एक तार लरज़ता है साज़-ए-हस्ती का अजीब वक़्त का सरगम है तुम न साथ चलो है चीरा दस्त-ए-ज़माना ये उन से कह दो 'जलील' तुम्हारी ज़ुल्फ़ भी बरहम है तुम न साथ चलो — Jaleel Allahabadi
इसी बाइ'से तो दुनिया की मुसीबत ग़म नहीं होती ये दुनिया ग़म तो देती है शरीक-ए-ग़म नहीं होती चराग़ों में लहू इंसानियत का जगमगाता है मगर इंसानियत की चश्म-ए-कम पुर-नम नहीं होती ख़ुशी महसूस करता हूँ तो दुनिया साथ देती है मुसीबत में मगर आमादा-ए-मातम नहीं होती ख़ुशी की शम्अ' तो ऐ दोस्त ज़द में आ भी जाती है मगर दाग़-ए-जिगर की रौशनी मद्धम नहीं होती सलीक़ा चाहिए आवाज़ को पहचान लेने का नवा-ए-शाइ'री हर दम नवा-ए-ग़म नहीं होती 'जलील' उन से बिछड़ कर इक ज़माना हो गया लेकिन अभी तक मेरे अश्कों की रवानी कम नहीं होती — Jaleel Allahabadi
हुसूल-ए-ग़म ब-अल्फ़ाज़-ए-दिगर कुछ और होता है दिल-ए-बर्बाद का अज़्म-ए-सफ़र कुछ और होता है तुलू-ए-सुब्ह की किरनें बहुत ही ख़ूब हैं लेकिन जमाल-ए-शहर-ए-दिल वक़्त-ए-सहर कुछ और होता है मसाइब किस को कहते हैं तुम्हीं जानो तुम्हीं समझो जहाँ वालो हमारा दिल जिगर कुछ और होता है शराब-ए-तल्ख़ क्या है ज़हर-ए-क़ातिल तक पिया हम ने मगर इन मस्त नज़रों का असर कुछ और होता है मुक़ाबिल आइने के आइना भी हम ने देखा है घटाओं में मिरा रश्क-ए-क़मर कुछ और होता है जहाँ पाबंदियाँ लाज़िम न हों सज्दा-गुज़ारों पर इबादत के लिए वो संग-ए-दर कुछ और होता है 'जलील' अक्सर ये पाया इम्तियाज़-ए-इश्क़ में हम ने इधर कुछ और होता है उधर कुछ और होता है — Jaleel Allahabadi