Madhav Awana shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Madhav Awana's shayari and don't forget to save your favorite ones.
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Nazm
देख कर किसी का देश के लिए उपवास, हम नेताओं का उड़ाते हैं उपहास
और देते हैं गालियाँ बस हमारा फ़र्ज़ पूरा जब भी होता है कोई आन्दोलन हम यार दोस्तों का कर के सम्मलेन निगाह सरकार पे डालते हैं सवालिया बस हमारा फ़र्ज़ पूरा देश जाता है जहाँ जाए नेता चाहे जैसे भी देश को चलाएँ हम ड्यूटी कर देते हैं पाँच साल बस हमारा फ़र्ज़ पूरा पानी हो चला है हमारा ख़ून अब कहाँ देश-भक्ति का जुनून रोज़ कहते हैं अच्छा नहीं हमारा क़ानून बस हमारा फ़र्ज़ पूरा हम डर से मानते हैं क़ानून-क़ाएदा ऐसी आज़ादी का क्या फ़ाएदा सच मानते हैं पाँच साल वाला वअ'दा बस हमारा फ़र्ज़ पूरा जल्दी भुला देते हैं ऊपर पड़ी लात को फिर क्यूँ भुनते हैं हम बिना बात को जब इतना ही बहाना बनाना है हम आप को कि बस हमारा फ़र्ज़ पूरा
ऊँची ऊँची इमारतों में मेरे हिस्से का आसमान लापता मसरूफ़ से इस शहर में जिस्म तो हैं इंसान लापता
सुनते थे कभी मिला करते थे जहाँ दिल के बदले दिल तेरे इस शहर में अब इश्क़ की है वो दुकान लापता इस शहर में बुत-कदे भी हैं और मस्जिदें भी तमाम इंसान की फ़ितरत देख कर हुए हैं भगवान लापता वाह री जम्हूरियत हम जिन्हें सौंपते हैं मुल्क अपना उनमें अक़्ल है होशियारी है ताक़त है बस ईमान लापता न जाने कौन सी बिजली गिरी कि उड़ना भूल गया मेरे दिल के अरमानों के पर तो हैं पर उड़ान लापता
मत शिकायत करो कि सरकार सो रही है ज़बाँ पे लगाम रखो कि सरकार सो रही है
महँगाई ने बे-शक जीना मुहाल किया है दिल की दिल में रखो कि सरकार सो रही है मत लगाओ नारे न उतरो सड़क पर जेल जाओगे पिटोगे, डरो कि सरकार सो रही है रोज़ दाम बढ़ाती है शायद हुक्म मिला है कहीं से जल्दी जेब ढीली करो कि सरकार सो रही है ये शाह ख़र्च है कि हुकूमत है इन की आम आदमी हो सड़-सड़ मरो कि सरकार सो रही है क़त्ल-ओ-ग़ारत हो कि इस्मतें लुटें रोज़ाना अपनी जाँ की ख़ैर करो कि सरकार सो रही है
फिर वही माहौल वही शोर-शराबा वही कुछ नए पुराने चेहरों का बोल-बाला
फिर से सज गई तब्दीलियों की मंडियाँ पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला फिर चीख़ते फिर रहे बद-हवास चेहरे फिर रचे जानें लगें हैं षड्यंत्र गहरे फिर से गूँजने लगें हैं फ़ज़ाओं में नारे पिछलग्गू बन गए हैं कुछ भूक के मारे फिर से ये बताई जाने लगी बदलाव की बातें फिर से कुर्सी क़ब्ज़ाने को होने लगीं हैं घातें फिर से आ गया है चुनाव का मौसम पांच-साला पर अस्ल में कुछ नहीं बदलने वाला कुछ आ जाएँगे चेहरे नए पुराने बन के रहनुमा लग जाएँगे देश को खाने फिर शुरूअ' होगा आम आदमी की तक़दीर से खेल फिर भेजा जाएगा कुछ हारे हुओं को जेल फिर से न्याय का ढोंग रचाया जाएगा आदमी को रोटी के वा'दे से बहलाया जाएगा फिर से होगा लूट-खसूट का नंगा नाच फिर झूठ को बताया जाएगा साँच मुझे जलाएगी मेरे अंदर की आँच और टूटते सपने चुभेंगे बन के काँच फिर से ज़िंदगी बुनने लगेगी मकड़-जाला मैं जानता हूँ कि कुछ नहीं बदलने वाला
हमारा राजा अंधा और बहरा राजा अपनी बनाई रतौंधी में मस्त है
न देख सकता है न सुन सकता है जड़ पत्थर सा कि हमें क्या कष्ट है पर राजा न जानें कहाँ से पता करता महसूस कर लेता कि जनता की जेब में है पैसे महँगाई बढ़ा कर टेक्स लगा कर हज़ार करोर से बहाने बना कर निकलवा लेता है कैसे न कैसे राजा अहंकार से भरा राजा बना रहता है सब से खरा राजा हल्क़ से निवाले खींचता है राजा हमारी दुर्दशा से आँखें मीचता है राजा पाँच साल में एक बार आता है राजा पथराई आँखों को सपने दिखता है राजा फिर पाँच साल को महल में सो जाता है जनता को बताया जाता है यही कि राजा होता है हमेशा सही राजा जनता की सेवा में वयस़्त है जबकि जानते हैं सभी हमारा राजा अपनी बनाई रतौंधी में मस्त है उसे क्या मतलब हम से कि हमें क्या दुख है क्या कष्ट है
ख़्वाब ही तो मिले हैं हमें रोटी के ख़्वाब ता'लीम के ख़्वाब हुक्मरानों ने दिखाए आज़ादी के बा'द नई तंज़ीम के ख़्वाब
पैंसठ साल के बा'द भी हम करते हैं उन की क़दम-बोसी हुक्मरानों ने क्या घोल कर दिए हैं इस यक़ीं के ख़्वाब ना सड़क ना बिजली ना पानी ना रोज़गार है मयस्सर मुल्क के इक्कीसवीं सदी में पहुँचने के ये हसीन से ख़्वाब मत आवाज़ उठा मत माँग इंसाफ़ जरा सा डर प्यारे वर्ना तू देखेगा हवालात में बैठ के नंगी ज़मीन पे ख़्वाब आँखों में भर ले हक़ीक़त के काँच के टुकड़े ताकि खुली रहें जागते हुए तय करें हम ख़ुद के लिए बेहतरीन से ख़्वाब
काँधे पर अपने करमों की सलीब दूर से तमाशाई मेरे हबीब मेरे रिश्ते मेरे फ़र्ज़ मेरा बीते वक़्त की परछाइयाँ सब मुझ पर कोड़े बरसाते ले जा रहें हैं अजनबी से मक़ाम पर लानतें बरसाते मेरे नाम पर मुझे रोज़ धक्कियाते और इस पर मजबूरी कि मुझे ख़ामोश रहना है सब चुप-चाप सहना है कोई न माने की मैं क्या हूँ पर मैं भी मसीहा हूँ
मैं ने कहा ये मुल्क एक है तो सब के लिए एक सा हो क़ानून
तो उन्होंने कहा कि मैं फिरका-परस्त की तरह बोलता हूँ मैं ने कहा कि मंदिर मस्जिद से ज़ियादा ज़रूरी है ता'लीम हर इंसान को और हर पेट को रोटी तो उन्होंने कहा कि मैं नास्तिक सा ईश्वर को ज़रूरत में तोलता हूँ मैं ने कहा कि तुम हम ने चुने हो तो हमारा विकास करो न सिर्फ़ अपनी तिजोरियाँ भरो तो उन्होंने कहा कि मैं बे-वज्ह राज़ खोलता हूँ मैं ने कहा सारा मुल्क एक है बस कुछ दिन में बदल देंगे मिल कर हम सारा निज़ाम वो कुछ नहीं बोले अब बस हँसते रहे मेरी बात और मेरे ख़यालात पर अब वो सब ज़ोर से हँस रहे है और मेरे पाँव जैसे धरती में धँस रहे हैं मैं जानता हूँ कि वो सारे मुल्क पर हँस रहे हैं
और सड़कों पर जलसे सजा इंक़लाब के नारे लगाऊँ बड़ा आसान है मेरे लिए मैं किसी पर ज़ुल्म होता पाऊँ तो आँखों वाला अंधा हो जाऊँ बड़ा आसान है मेरे लिए सियासतदानों पर झल्लाऊँ और कुछ करने के नाम पर अपनी मजबूरियाँ गिनाऊँ बड़ा आसान है मेरे लिए कि मैं ज़िंदा लाश हो जाऊँ ख़ुद डरूँ और परिवार को डराऊँ। पर मेरे भीतर जो है एक रूह सी जब पूछती है मुझ से कहाँ जाऊँ ज़िंदा लाश होना भी आसान नहीं मैं इसे कैसे समझाऊँ