ताईद-ए-ग़ैब ताले-ए-फ़र्ख़न्दा की मदद
वो इशवा-संज आज हुआ हम-कलाम-ए-शौक़
क़ासिद किया है अहद जो ईफ़ा-ए-अहद का
सुब्ह-ए-उमीद-ए-वस्ल हुई अपनी शाम-ए-शौक़
क्या मुत्तसिल हो यार तलव्वुन है तब्अ में
ये देर-पा कहाँ है तुम्हारा क़याम-ए-शौक़
मद्द-ए-नज़र जो है वो हमें आश्कार हो
ऐ जज़्ब-ए-दिल-नवाज़ मदार-उल-महाम-ए-शौक़
मज्ज़ूब-ए-इश्तियाक़ हैं मस्त-ए-मय-जमाल
रोज़-ए-नुख़ुस्त से है ये शर्ब-ए-मुदाम-ए-शौक़
बे-राह जा रहा है तुझे कुछ ख़बर नहीं
किस फेर में पड़ा है बता हर्ज़ा-गाम-ए-इश्क़
इस कैफ़-ए-ज़ौक़-ओ-शौक़ में तस्वीर-ए-यार है
फ़र्रुख़-सरोश ने ये दिया है पयाम-ए-शौक़
तौफ़ीक़ का है फ़ैज़ निगाह-ए-दलील-ए-राह
हम को मिला है ग़ैब से कास-उल-किराम-ए-शौक़
'साक़ी' वो देख शाहिद-ए-मय-नोश आ गया
लबरेज़ है ये शाएक़-ए-नज़्ज़ारा जाम-ए-शौक़
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वो पास है तेरे दूर नहीं तू वासिल है महजूर नहीं
क्यूँ हब्ल-ए-मुरक्कब में है फँसा मुख़्तार है तू मजबूर नहीं
क्यूँ हब्ल-ए-मुरक्कब में है फँसा मुख़्तार है तू मजबूर नहीं
सरगर्म-ए-शौक़-ओ-हुज़ूर नहीं दिल सर्द है तू महरूर नहीं
जिस क़ल्ब में इश्क़ का नूर नहीं वो ताब-ए-जल्वा-ए-तूर नहीं
हर रंग में है वो जल्वा-नुमा तू एक हिजाब में जा के छपा
क्यूँ कोर सवाद हुआ है बता क्या आँखों में तिरे नूर नहीं
जो इश्क़ में बर-सर-ए-दार हुआ सरदार वही सरशार हुआ
सरमस्त विसाल-ए-यार हुआ किस तरह कहें मंसूर नहीं
जो बातिन में मशग़ूल हुए महबूब हुए मक़्बूल हुए
मजहूल हुए मारूफ़ कहाँ मशहूर जो हैं मंज़ूर नहीं
क्यूँ महव-ए-सर-ए-पिंदार हुआ ऐ मुश्त-ए-ख़ाक है नक़्श-ए-फ़ना
दुनिया में कहाँ है रंग-ए-बक़ा जमशेद नहीं मग़्फ़ूर नहीं
मस्तूर जो था मंज़ूर हुआ वो जल्वा-ए-रंग-ए-ज़ुहूर हुआ
जो हिजाब था रुख़ से दूर हुआ मुश्ताक़-लक़ा महजूर नहीं
जो आप हुआ बेनाम-ओ-निशाँ उस को है मिला वो जान-ए-जहाँ
मेराज-ए-विसाल है उस को कहाँ जो इश्क़ में चकना-चूर नहीं
मैं तेरा फ़िदा-ए-सरापा हूँ मैं तालिब-ए-वस्ल-ए-मुअर्रा हूँ
मुश्ताक़-ओ-शैदा तेरा हूँ मैं तालिब-ए-हूर-ओ-क़ुसूर नहीं
मख़मूर-ए-जाम-ए-बाक़ी है शैदा-ए-नवा-ए-इराक़ी है
सरशार-ए-मोहब्बत 'साक़ी' है सर-मस्त है ये मस्तूर नहीं
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तुम ने देखा ही नहीं है वो निज़ाम-ए-मख़्सूस
कू-ए-जानाँ में हमारा है क़याम-ए-मख़्सूस
कू-ए-जानाँ में हमारा है क़याम-ए-मख़्सूस
मुजतमा आज हैं यारान-ए-सर-ए-पुल सारे
ख़ल्वत-ए-ख़ास में है मजमा-ए-आम-ए-मख़्सूस
जलसा-ए-आम में दिक़्क़त नहीं होती उन को
जो समझते हैं इशारों में कलाम-ए-मख़्सूस
दिल-ए-ग़म-दीदा हुआ हमदम-ए-सद-गूना-नशात
आज आया है जौ दिलबर का पयाम-ए-मख़सूस
वो मिरा सुब्ह-नफ़्स मुख़लिस-ए-यक-रंग हुआ
अब न वो सुब्ह-ए-मुक़र्रर है न शाम-ए-मख़्सूस
ख़ूब एज़ाज़ गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत का हुआ
उन को है मद्द-ए-नज़र क़ैद-ए-दवाम-ए-मख़्सूस
आम से ख़ास की तमईज़ हुआ करती है
हो गया नोक-ए-ज़बाँ शोख़ को नाम-ए-मख़्सूस
नक़्स ये वज़्अ' का हो जाएगा दाग़-ए-इस्मत
क्यूँ वो शब-गर्द हुआ माह-ए-तमाम-ए-मख़्सूस
राज़दाँ जो हैं समझते हैं वो ये राज़-ओ-नियाज़
गुफ़्तुगू ख़ास से होता है कलाम-ए-मख़्सूस
है तिरा बुलबुल-ए-कश्मीर यगाना मय-कश
आम होता ही नहीं शर्ब-ए-दवाम-ए-मख़्सूस
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जिस को शग़्ल-ए-नफ़ी-ओ-इस्बात है
वो ही साहिब-दिल है ख़ुश-औक़ात है
सहव होता है कभी होता है महव
क्या मज़े का अपना ये दिन-रात है
ना-मुराद-ए-दहर फ़र्द-ए-दहर है
वो जहाँ में क़ाज़ी-उल-हाजात है
हों सिफ़ात-ए-नफ़्स जिस के क़ल्ब-ए-रूह
वो बशर कब है वो हुस्न-ए-ज़ात है
साहब-ए-निस्बत का रुत्बा है बुलंद
गरचे ज़ाहिद साहबुद्दा'वात है
बस्त में जब कब्ज़ का दौरा हुआ
है क़यामत नज़्अ' की सकरात है
वो तअ'य्युन ही के फंदे में रहा
जो यहाँ पाबंद-ए-महसूसात है
मुग़्बचो हो जाओ तुम भी बे-नियाज़
पीर-ए-मुग़ तो क़िबला-ए-हाजात है
हम भी हैं 'साक़ी' तलाश-ए-यार में
वो जो मिल जाए तो फिर क्या बात है
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तुझे ख़ल्क़ कहती है ख़ुद-नुमा तुझे हम से क्यूँ ये हिजाब है
तिरा जल्वा तेरा है पर्दा-दर तेरे रुख़ पे क्यूँ ये नक़ाब है
तिरा जल्वा तेरा है पर्दा-दर तेरे रुख़ पे क्यूँ ये नक़ाब है
तुझे हुस्न माया-ए-नाज़ है दिल-ए-ख़स्ता महव-ए-नियाज़ है
कहूँ क्या ये क़िस्सा-ए-राज़ है मिरा इश्क़ ख़ाना-ख़राब है
ये रिसाला इश्क़ का है अदक़ तिरे ग़ौर करने का है सबक़
कभी देख इस को वरक़ वरक़ मिरा सीना ग़म की किताब है
तिरी जज़्ब में है रुबूदगी तेरे सुक्र में है ग़ुनूदगी
न ख़बर शुहूद-ओ-वजूद की न तरंग-ए-मौज-ए-सराब है
ये वही है 'साक़ी'-ए-शेफ़्ता जो है दिल से तेरा फ़रेफ़्ता
ये है तेरा बंदा गुरीख़ता कि जो ख़ाकसार-ए-तुराब है
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तसव्वुफ़ तबद्दुल है आदात-ए-बद का
तअर्रुफ़ नतीजा है ख़ुल्क़-ए-हसन का
वही गुल शजर है वही बोस्ताँ है
वही आप है बाग़बाँ इस चमन का
वो बे-कैफ़-ओ-कम है क़दीम-ओ-अज़ल से
उसी से है ये नक़्श-ए-दहर-ए-कुहन का
तवल्ला समझ हम-ज़बानी से बेहतर
तअश्शुक़ हुआ हम-दम-ओ-हम-सुख़न का
रम-ओ-शौक़ की भी अजाइब कशिश है
बुरा हाल है आशिक़-ए-ख़स्ता-तन का
जो सिर्र-ए-ख़फ़ी है वो ऐन-ए-जली है
खुला आज उक़्दा ये सिर्र-ए-दहन का
लताइफ़ में मुज़्मर है तस्वीर-ए-वहदत
ये ख़ल्वत में पैदा है लुत्फ़ अंजुमन का
नज़र बर-क़दम है तरीक़-ए-तसव्वुर
रम-ओ-शौक़ जादा है सिर्र-ओ-एलन का
निहाँ से अयाँ है अयाँ में निहाँ है
ये जादा मिला है सफ़र दर-वतन का
सुलूक-ए-तरीक़त है आफ़ाक़-ओ-अन्फ़ुस
कि जल्वा है तनज़ीह में सीम-तन का
वो बे-पर्दा भी पर्दा-पोश-ए-नज़र है
हिजाब आ गया है हमें हुस्न-ए-ज़न का
कभी शाद-ओ-ख़ंदाँ कभी ज़ार-ओ-नालाँ
तमाशा है 'साक़ी' के दीवाना-पन का
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इक न इक मुझ पर सदा आलम रहा
मैं कभी बे-जाँ कभी बे-दम रहा
मेरी क़िस्मत की कजी का अक्स है
ये जो बरहम गेसू-ए-पुर-ख़म रहा
वो दिल-ए-ग़म-गीं है मेरा ग़म-पसंद
ग़म के जाने का भी जिस को ग़म रहा
दिल को हर-दम इक परेशानी रही
ज़ुल्फ़-ए-जानाँ की तरह बरहम रहा
वो नमक-अफ़्शानियाँ क़ातिल ने कीं
ज़ख़्म-ए-दिल शर्मिंदा-ए-मरहम रहा
बढ़ते बढ़ते हो गया नासूर दिल
ख़ून का क़तरा जो दिल में जम रहा
था फ़क़त इक ग़म मदार-ए-ज़िंदगी
ग़म रहा दिल में तो वो भी कम रहा
गिर्या-ओ-ज़ारी यही 'साक़ी' रही
दिल की हसरत का सदा मातम रहा
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तलाश जिस नूर की है तुझ को छुपा है तेरे बदन के अंदर
ज़ुहूर-ए-आलम हुआ उसी से वो है हर इक जान-आे-तन के अंदर
ज़ुहूर-ए-आलम हुआ उसी से वो है हर इक जान-आे-तन के अंदर
तुझे ये बे-सर्फ़ा जद्द-ओ-कद है कशाकशी में भी शद्द-ओ-मद है
नफ़स की तुझ को अगर मदद है सफ़र है इस जा वतन के अंदर
तुझे वहाँ से गुरेज़ ओ रम है तलाश अब आहू-ए-हरम है
चला है वो राह जो भरम है, है मुश्क-ए-नाफ़ा ख़ुतन के अंदर
जहाँ में सारा है नूर तेरा हर एक शय में ज़ुहूर तेरा
मगर तख़य्युल है दूर तेरा पड़ा है बैत-उल-हुज़न के अंदर
तू ही मुहक़क़िक़ तू ही मुजद्दिद बना है तू आप ही मुक़ल्लिद
तू रस्म-ओ-रह का हुआ मुक़य्यद फँसा है ख़ुद मा-ओ-मन के अंदर
क़दीम वीराँ-कदा है हस्ती समझ इसे है फ़ना की बस्ती
ये तेरी हिम्मत की सब है पस्ती ज़ुबूँ है दहर-ए-कुहन के अंदर
अजीब अहमक़ है और सादा सवार हो कर हुआ पियादा
किधर चला ये नहीं है जादा तू क्यूँ भटकता है बन के अंदर
ये आतिश-ए-इश्क़ की है जिद्दत कि दिल में पैदा हुई है रिक़्क़त
ये सोज़-ए-ग़म की मिली है लज़्ज़त मज़ा है दिल की जलन के अंदर
हुआ है मस्त-ए-शराब-ए-गुलगूँ अकड़ रहा है वो सर्व-ए-मौज़ूँ
दिखा के हम को ये जाम-ए-वाज़ूँ ख़जिल किया अंजुमन के अंदर
हुआ है सरशार वहम-ए-'साक़ी' तुझे नहीं शौक़-ए-वस्ल बाक़ी
हवा-ए-दुनिया का है मिराक़ी पड़ा है आवागवन के अंदर
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मुझ से कहते हो क्या कहेंगे आप
जो कहूँगा तो क्या सुनेंगे आप
जो कहूँगा तो क्या सुनेंगे आप
क्या बयान-ए-शब-ए-फ़िराक़ करें
न सुना है न अब सुनेंगे आप
नहीं खुलता सबब तबस्सुम का
आज क्या कोई बोसा देंगे आप
नासेहा आप ख़ुद ही नादाँ हैं
क्या नसीहत मुझे करेंगे आप
दम-ए-आख़िर ये था मिरे लब पर
किस पे जौर-ओ-सितम करेंगे आप
ज़ुल्म की कुछ भी इंतिहा होगी
या हमेशा सितम करेंगे आप
मुंतज़िर हैं तुम्हारे मुद्दत से
देखिए हम से कब मिलेंगे आप
दर्द ना-गुफ़्ता-ब हो जब साक़ी
वो सुनें भी तो क्या कहेंगे आप
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सालिक है क्यूँ तख़य्युल-ए-तर्क-ए-वजूद में
नक़्श-ए-सुवर का रंग है तेरे शुहूद में
जो आ गए तजल्ली-ए-तंज़ीह-ए-ज़ात में
महदूद किस तरीक़ से होंगे हुदूद में
राज़-ए-दरून-ए-पर्दा ज़े-रिंदान-ए-मस्त पुर्स
सालिक है क्यूँ हिजाब-ए-शुहूद-ओ-वजूद में
अरिनी ओ लन-तरानी का सब राज़ खुल गया
क्या नश्शा-ए-ग़रीब है शर्ब-उल-यहूद में
ऐ गुल जहाँ में जिन को तिरा इश्क़ हो गया
वो ख़ार से खटकते हैं चश्म-ए-हुसूद में
मशहूर-ए-ख़ल्क़ जो है वो मक़्बूल-ए-हक़ नहीं
क्यूँ अहमक़ों को नाज़ हुआ है नुमूद में
ताअत नहीं है वो कि जो हो बे-हुज़ूर-ए-क़ल्ब
ऐ शैख़ क्या धरा है रुकू-ओ-सुजूद में
है बुल-अजब ये ज़मज़मा-ए-सौत-ए-सरमदी
किस तरह आए मा'रिज़-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद में
सूफ़ी ये सहव महव हुए सद्द-ए-बाब-ए-उंस
क्या इम्बिसात कार-गह-ए-हसत-ओ-बूद में
तार-ए-नफ़स से है तन-ए-ख़ाकी बसा हुआ
है अंकबूत लिपटी हुई तार-ओ-पूद में
सूफ़ी यही है नूर-ए-सवाद-ए-हिजाब-ए-क़ल्ब
ज़ुल्मत हुई जो सीना-ए-सोज़ाँ के दूद में
फ़ैज़-ए-निगाह-ए-रहबर-ए-कामिल का है असर
'साक़ी' है महव ताअत-ए-रब्ब-ए-वदूद में
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