YAAR
YAAR
Ghazal

हाए ज़ालिम और फ़र्ज़ी सी ख़ुमारी हो न जाए

जो बची नफ़रत दिलों में है पुरानी हो न जाए

भुखमरी में बद्दुआओं से मुझे डर लग रहा है
जो फ़क़ीरों ने कहा था वो कहानी हो न जाए

गर बदन की अचकनें कम हो रही हैं तो लगेगा
ज़िंदगी भर के लिए वो अब तुम्हारी हो न जाए

आप से ये दोस्ती तो बच नहीं पाई कहूँ क्या
अब कहीं ये दुश्मनी भी ख़ानदानी हो न जाए

शहर में वो सिर्फ़ अरमानों तले आया हुआ है
बोझ ज़िम्मेदार है जिस का सवाली हो न जाए

पान खाती लड़कियाँ जो दूर से तुम देखते हो
ये तुम्हारी आँख जो है ज़ा'फ़रानी हो न जाए

ग़ौर से मत देख उस को वो तुझे भैया कहेगी
छोड़ जाने दे कहीं वो बद-गुमानी हो न जाए

शायरा परवीन जैसी मैं मुहब्बत देख भी लूँ
यार सरवत ट्रेन वाली ज़िंदगानी हो न जाए

— YAAR

More by YAAR

Other ghazal from the same pen

See all from YAAR →

Terrorism Shayari

Shers of terrorism.

All Terrorism Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling