YAAR
YAAR
Ghazal

तेरा यहाँ होना कि कोई भी यहाँ रहता नहीं

कुछ भी हुई हो दास्ताँ ये दिल कभी सहमा नहीं

ऐसा नहीं कुछ चाहिए था उस फ़रेबी से मुझे
उम्मीद थी मुझ को समझ लेगा मगर समझा नहीं

वो आरसी में देख के ख़ुद को बनाती हो मगर
तेरा उसे नज़रें मिला के देखना अच्छा नहीं

इन सिसकियों ने आह को रोका हुआ है आज भी
तू देख मेरी आँख से दरिया कभी बहता नहीं

कब तक रहूँ तेरी गली में तू दरीचा खोल दे
दीदार जब होता नहीं मुझ को सुकूँ रहता नहीं

इक मर्तबा तुम देख लो सब कुछ यहाँ मौजूद है
तुम कह रहे थे बारहा पर कुछ यहाँ मिलता नहीं

वो तो जुदा हो के गया था फिर भला क्यूँ आ गया
ये ज़ुल्म उस का फिर सताएगा मुझे अच्छा नहीं

— YAAR

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