कुछ देर तो डरे तेरी जादूगरी से हम
फिर देखने लगे तुझे संजीदगी से हम
जो भी मिला वो रख लिया हमने सहेज कर
अब और क्या ही माँगते इस आशिक़ी से हम
यूँ हर किसी से भी कोई मिलता है क्या गले
उकता गये हैं अब तिरी आवारगी से हम
बस एक अंधेरे ने ही निभाई है दोस्ती
क्यूँ इल्तिजा करें तू बता रौशनी से हम
पहले पहल तो लड़ लिए अल्लाह से मग़र
अब पेश आ रहे हैं बड़ी आजिज़ी से हम
यह जानते हैं हम या ख़ुदा जानता है बस
कैसे निकल के आये हैं उस तीरगी से हम
अब क्यों अमान ढूँढते हैं उसको दर बदर
जिसको निकाल फेंक चुके ज़िंदगी से हम
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