जिस जहाँ में नफ़रतों की हस्तियाँ रह जाएँगीं
कैसे उस उजड़े चमन में तितलियाँ रह जाएँगीं
बेच कर रातें, ख़रीदे ख़्वाब जिन के वास्ते
नींद आने दे ज़रा बस सिसकियाँ रह जाएँगीं
सरहदें बे-ख़ौफ़ हैं जब तक खड़े हैं हम वहाँ
हम गए तो टूटने को चूड़ियाँ रह जाएँगीं
हर किसी से प्यार करना याद रखना ये मगर
रुख़्सती के वक़्त फैली मुठ्ठियाँ रह जाएँगीं
आज फिर ये शोर सन्नाटों में गुम हो जाएगा
और सड़कों पर चमकती बत्तियाँ रह जाएँगीं
जिस तरह से बट रहे हैं लोग मजहब में 'अमित'
देख लेना बस ये सूनी बस्तियाँ रह जाएँगीं
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