नज़र से दूर के कूचे रखी है

बुराई रात के हिस्से रखी है

ये कैसा बोतलों का ढेर सा है
ये किस ने ज़िंदगी पी के रखी है

उदासी को कहाँ पे ढूँढ़ते हो
उदासी दर्द के शाने रखी है

मैं तो आगे निकल आया उदासी
परेशानी ज़रा पीछे रखी है

किताबों में दबा कर फ़ोटो उस की
गुलाबों की तरह काहे रखी है

हमारी ये ख़मोशी कौन समझे
हमारे दरमियाँ जैसे रखी है

मिरी हर इक दुआ तरतीब से है
तभी उस की ख़ुशी पहले रखी है

— Ajay Kumar

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