KARAN
KARAN
Ghazal

ऐ 'करन' मोहतात रह, चोरों से अब

मत लगा उम्मीद 'कश-कोरों से अब

एक गठरी थी, ख़ज़ाने में मेरे
हाए! वो भी जा मिली, चोरों से अब

बढ़ गया मेआ'र, ग़ज़लों का मियाँ
मिल रहे हैं, दर्दो-ग़म, ज़ोरों से अब

ख़ून में मुदग़म था साहिब, बह गया
इश्क़, मेरी आँख की, कोरों से अब

ऊब आती है, मुझे यूँ, शोर से
चीख़ मत ऐ ख़ामुशी, ज़ोरों से अब

इतने ख़त, लिक्खे हैं तुझ को उम्रभर
टीस-सी, उठने लगी, पोरों से अब

ले समेट अपना ये ग़म और कूच कर
कौन उलझे ऐसे, मुँह-ज़ोरों से अब

अब फ़रेब, इनसे न खाऊँगा 'करन'
ख़ूब वाकिफ़ हूँ मैं चित-चोरों से अब

— KARAN

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