अपना ग़म, अपना सरमाया होता है
मुश्किल में, हर शख़्स पराया होता है
अपने बख़्त की, ये 'हुश्यारी है, साहिब
रोज़, हुनर गलियों में ज़ाया' होता है
आगे-आगे चलती है, ये तन्हाई
पीछे-पीछे, अपना 'साया होता है
रोज़ सु'बह फिर तुझ को पाने की चाहत
रात गए तक दिल, समझाया होता है
मय-ख़ाने की 'चौखट पर आ मिलते हैं
इश्क़ ने जिन को भी, ठुकराया होता है
सच कहता हूँ, उस पागल सी लड़की ने
पर्दे में इक 'चाँद, छुपाया होता है
चारा-साज़ो! उस का मरहम क्या होगा
ज़ख़्म 'मुहब्बत में जो, खाया होता है
देख करन उस बज़्म में मत पढ़ना ग़ज़लें
नक़्क़ादों ने जाल, बिछाया होता है
— KARAN















