KARAN
KARAN
Ghazal

अपना ग़म, अपना सरमाया होता है

मुश्किल में, हर शख़्स पराया होता है

अपने बख़्त की, ये 'हुश्यारी है, साहिब
रोज़, हुनर गलियों में ज़ाया' होता है

आगे-आगे चलती है, ये तन्हाई
पीछे-पीछे, अपना 'साया होता है

रोज़ सु'बह फिर तुझ को पाने की चाहत
रात गए तक दिल, समझाया होता है

मय-ख़ाने की 'चौखट पर आ मिलते हैं
इश्क़ ने जिन को भी, ठुकराया होता है

सच कहता हूँ, उस पागल सी लड़की ने
पर्दे में इक 'चाँद, छुपाया होता है

चारा-साज़ो! उस का मरहम क्या होगा
ज़ख़्म 'मुहब्बत में जो, खाया होता है

देख करन उस बज़्म में मत पढ़ना ग़ज़लें
नक़्क़ादों ने जाल, बिछाया होता है

— KARAN

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