आँख का क़सूर आरज़ू के क़ाफ़िले हुए
अश्क से की है दुआ ये होंठ हैं सिले हुए
तू नज़र इधर करे तो दिल मेरा धड़क उठे
हो गया दशक यहाँ जिगर मेरा हिले हुए
रोम रोम ये रहा पुकार बस तुझे यहाँ
साँस में ये राग तेरे हैं घुले मिले हुए
दूर क्यूँ हुए भला मैं सोचता यही रहा
माफ़ कर भुला भी दे जो दरमियाँ गिले हुए
कर दिया मुझे जुदा न कुछ कहा न कुछ सुना
एक वक़्त में यहाँ हज़ार सिलसिले हुए
जब तेरे क़दम पड़े तो दिल मेरा चमन हुआ
हर तरफ़ तेरे लिए गुलाब हैं खिले हुए
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