"नामालूम"

तुझ को लगता है जो पेड़ सूखे हुए हैं उन्हें सूखने का सबब है ख़िज़ाँ
तुझ को लगता है सागर जो ठहरा हुआ है वो ठहरा हुआ है यूँ ही बे-वजह
तुझ को लगता है सहरा में जो धूल है उड़ रही है वो बस आँधियों के सबब
तुझ को लगता है जो कुछ हुआ है वो बस हो गया है यूँ ही जो हुआ वो बजा

तू नहीं जानती पँछियों ने ही ख़ुद तोड़ डाले हैं अपने घरौंदे
मगर अब वो बे-घर हैं और ढूँढ़ते हैं किसी और के घोंसले
क्यूँकि उन की सजाई हुई शाख़ पर किसी
अंजान परिंदे ने अपने घरौंदे बनाए हुए हैं
कि फिर जो पा सकें नेह जो उन को पहले मिला था कभी
आस ले कर के ऐसी तेरे दर पे आए हुए हैं

तू समझती है ये पेड़ यूँ ही गिरा है
नहीं
इस की शाख़ों पे पंछी नहीं थे
इसी के सबब ख़ुद-कुशी कर चुका है

तू समझती है ये जो इमारत है बस वक़्त की मार से ढह गई है
नहीं
इस को तन्हाइयों ने सताया बहुत
बरग़लाया बहुत
बस इसी के सबब अपनी बुनियाद को छोड़ कर जा रही है

तुझ को लगता है इन राहगीरों को अब तक मिला ही नहीं है कोई कारवाँ
पर ये वो हैं जो भीड़ों में छुप न सके और अकेले किसी को दिखे ही नहीं
इनको तन्हाइयों ने रुलाया बहुत
फिर इन्होंने मगर उन ही तन्हाइयों को ग़ज़ल कर दिया

तू नहीं जानती इन दरख़्तों को इन की जड़ों ने कभी इन के पत्तों तलक झील के पानी से भी सींचा नहीं

तू नहीं जानती ये नदी जो समुंदर की बाहों में भरने को अपने ख़यालात की मस्तियों में बँधी बह रही थी
इसे उन पहाड़ों ने रोका हुआ है जिन्हें एक दिन अपने बादल के पानी में भीगे हुए सर्दियों में सिसकने का अभिशाप था

तू नहीं जानती आइनों का वो दुख जो कि दीवार पर लटके रहते हैं और ढूँढ़ते हैं वो चेहरा जो दिखने में ख़ुद्दार हो
और ज़माने की नज़रों में बेकार हो
फिर मगर झुर्रियों से भरे अक्स देखें तो ये सोचते हैं
क्या इनको किसी ने इसी के लिए रेत की धड़कनों से निचोड़ा था

तू नहीं जानती कि वो मज़दूर ईनाम लेने गए थे
मगर शाह ने उन के फ़न को ही उन से अलग कर के ऐसा शहर गढ़ दिया
कि जहाँ अठारह हज़ार बे-हाथ लोगों की बाशिंदगी थी
जहाँ अब तलक इक हसीं ताज के चौदह दफ़ा हामिला होने की चीख़ें गढ़ी हैं
मगर उस इमारत को फिर भी मुहब्बत की झूठी निशानी बनाया गया

तू नहीं जानती मैं वही रेत हूँ
जिस को जितना दबाया गया मुट्ठियों में
वो उतनी ही ज़्यादा फिसलती गई और फिर जा गिरी दामनों में किसी के
मगर फिर वहाँ भी ये रह न सकी
जिस का दामन था उस की ही आँखों में ये रेत चुभने लगी
उस ने दामन को अपने सफ़ा कर दिया
रेत को दामनों से जुदा कर दिया

— Praveen Sharma SHAJAR

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