बे-वजह की हँसी से परेशान हो गए
हम अपनी ज़िन्दगी से परेशान हो गए
इस दर्जा तीरगी में गुज़ारी है ज़िन्दगी
जुगनू की रौशनी से परेशान हो गए
दुश्मन की दुश्मनी ने न छीना सुकूने-क़ल्ब
अपनों की दोस्ती से परेशान हो गए
देखे हैं संग दिल मिरी आँखों ने इस क़दर
फूलों की नाज़ुकी से परेशान हो गए
हम ने तो सारी उम्र गुज़ारी इसी तरह
तुम तो मियाँ अभी से परेशान हो गए
हम-अस्र शाएरों का है मौज़ू-ए-गुफ्तुगू
"क़म्बर" की शा'इरी से परेशान हो गए
— Qambar Naqvi















