पूछ बैठा मैं ख़ुदी से

क्या मिला है ख़ुद-कुशी से

दिल अकेला क्या ही करता
हार बैठा अजनबी से

यार तुम पैसे कमाओ
क्या मिलेगा आशिक़ी से

तितलियों के इक सबब से
फूल बन बैठा कली से

दुश्मनी कोई भी कर ले
मैं मरूँगा बस इसी से

मौत आनी है सभी को
आज तो जी ले ख़ुशी से

फूल कलियाँ तोड़ लाया
बाँटता हूँ क्यूँ ख़ुशी से

रीत दुनिया की यही है
फ़र्क क्या पड़ता सही से

ख़ुद से जो मैं कह रहा हूँ
आज कह दूँगा सभी से

— Ranjan Kumar Barnwal

More by Ranjan Kumar Barnwal

Other ghazal from the same pen

See all from Ranjan Kumar Barnwal →

Wajood Shayari

Shers of wajood.

All Wajood Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling