मुआ'फ़ी से फ़क़त दिल से गिले शिकवे नहीं जाते
सहर आ जाती है पर रात के धब्बे नहीं जाते
बरसती हैं कभी आँखें कभी जलने ये लगती हैं,
ये सूखे फूल हम से इस तरह देखे नहीं जाते
वफ़ा की बात है ख़ुद से तो शीशा देख लेते हैं,
वगरना हम से ऐसे लोग भी देखे नहीं जाते
कोई जज़्बात का कैसे करे इज़हार चिठ्ठी में,
जो दिल में हैं वो काग़ज़ क्या कहीं लिक्खे नहीं जाते
मैं ख़ाली हाथ वापस जा रही हूँ उस की दुनिया से
ख़ुदा भी चीख़ता होगा नहीं ऐसे नहीं जाते
— Ritika reet















