‘’निगाह’’
किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी
अक्स मेरा मिलेगा जिस जगह देखोगी
जान मोहब्बत फ़िज़ूल नहीं बस थोड़ा सब्र करो
नाग़वार गुज़रे इश्क़ की पनाह देखोगी
किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी
पर मसअला कुछ इनकार का ज़रूर रहा होगा
जिस से ख़ुद बे-ख़बर हूँ वो मेरा क़ुसूर रहा होगा
फिर इल्ज़ाम सारे बेबुनियाद से आएँगे आगे
मेरे ख़िलाफ़ ना एक मिलेगा जो गवाह देखोगी
किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी
पर तेरा छोड़ के जाना मोहब्बत की तौहीन था
मेरा क्या? मेरा दिल तो टूटने का शौक़ीन था
अभी एक दुआ क़ुबूल होनी आम बात समझती हो
फिर कोई मंदिर और सालो साल कोई दरग़ाह देखोगी
किस की ऐसी हया भरी निगाह देखोगी















