“कहाँ हो माँ”
तुम्हारे बा'द माँ चारों तरफ़ घर में उदासी है
ये आँगन उजड़ा उजड़ा है ये आँगन सूना सूना है
मुझे अब अपना ये घर मिस्ल-ए-क़ब्रिस्तान लगता है
मकाँ में अब मकीं वीरानियाँ होने लगी हैं माँ
ये मंज़र देख कर घर का मिरा दम घुटने लगता है
मिरे सीने में दिल है दिल के अंदर बे-क़रारी है
मिरी आँखों के दर से ख़ून का दरिया निकलता है
ज़मीन-ए-लब पे जो पहले ख़ुशी के फूल खिलते थे
वो सब मुरझा चुके हैं माँ
समझ में ये नहीं आता बयाँ कैसे करूँ इस को
तुम्हारे दूर जाने से
जो सदमा दिल पे गुज़रा है
जो रंज-ओ-ग़म उठाए हैं
जो मैं ने दर्द झेला है
बयाँ कैसे करूँ उस को
मिरे लब कपकपाते हैं
बदन भी थरथराता है
मैं जब बाहरस आ कर घर के अंदर पाँव रखता हूँ
तो मेरी नज़रें फ़ौरन घर में उस जानिब को जाती हैं
जहाँ तुम बैठा करती थीं
जहाँ तुम बैठ कर हर रोज़ मेरी राह तकती थीं
मुझे जब वो जगह ख़ाली नज़र आती है मेरी माँ
तो मेरे फूल से दिल पर ग़मों की बिजली गिरती है
अचानक से बदन पर तेज़ लर्ज़ा तारी होता है
ये मेरे पाँ ज़मीं के सद्र पर यूँ लड़खड़ाते हैं
मैं गिर पड़ता हूँ मेरी माँ
मैं ग़श खाकर ज़मीं के सद्र पर ही हाल से बे-हाल होकर जान खोता हूँ
मुझे जब होश आता है मैं अपने हाल की परवाह नहीं करता हूँ प्यारी माँ
तुम्हारे दूर जाने का अलम दिल पर उठा कर मैं मुसलसल ख़ून रोता हूँ
गिरेबाँ चाक करता हूँ
तमाचे मार कर रुख़ पर मैं रुख़ को लाल करता हूँ
मैं तुम को घर के हर हिस्से के अंदर ढूँढ़ता हूँ माँ
तुम्हें घर में न पाकर लब से ये फ़िक़रा निकालता है
कहाँ हो माँ
अगर नाराज़ हो मुझ से तो मेरी इल्तिजा है माँ
ख़ुदा के वास्ते नाराज़गी को दूर कर दो तुम
ख़ुदारा रू-ब-रू आओ
मुझे पहले के जैसे अपनी जाँ कह कर सदाएँ दो
कहाँ हो माँ
मुझे आग़ोश में ले लो
मिरी माँ तुम मिरी पहले के जैसे फिर बलाएँ लो
मिरी माँ प्यारी माँ फिर मेरी पेशानी पे अपने फूल से होंठों के पाँ फिर नक़्श कर दो तुम
मुझे आराम आ जाए
बड़ा बैचैन रहता हूँ
मिरी माँ मुख़्तसर ये है
तुम्हारे दूर जाने से
तुम्हारे लाल का इस दुख भरी दुनिया के अंदर एक पल को दिल नहीं लगता
तुम्हारी याद में बस बैठ कर मैं रोता रहता हूँ
अरे हाँ याद आया माँ
तुम्हारे बारे बाबा जान से जब पूछता हूँ मैं
मिरे बाबा कहाँ है माँ
तो बाबा जान की पलकों पे कुछ मोती नुमा सी शय
नज़र आती है प्यारी माँ
मैं फिर से पूछता हूँ प्यारे बाबा जाँ
कहाँ है माँ
तो बाबा पास आते हैं
मुझे सीने लगाते हैं
वो फिर गोदी में लेते हैं
मिरे सर पर वो अपना हाथ रख कर मुझ से कहते हैं
मिरे लख़्त-ए-जिगर नूर-ए-नज़र दिलबर मिरे हमदम
सुनो सर को उठाओ आसमाँ की सिम्त देखो तुम
वो जो महताब की करवट में एक रौशन सितारा है
तुम्हारी प्यारी माँ है वो















