अब तो अच्छी चल रही है ज़िंदगी थोड़ी बहुत
मुझ को भी आने लगी है शा'इरी थोड़ी बहुत
अब तो आते-जाते रहना है मुझे इस शहर में
क्यूँ न कर लूँ मैं सभी से दोस्ती थोड़ी बहुत
अपनी खिड़की का वो पर्दा खोलती है जब कभी
मुझ को भी आ जाती है फिर रौशनी थोड़ी बहुत
माँ हमेशा बोलती है तू कभी ये करना मत
दोस्तों से सुनता हूँ कर मैकशी थोड़ी बहुत
कौन करता है किसी इक शख़्स पे ही शा'इरी
मैं तो करता हूँ सभी पे शा'इरी थोड़ी बहुत
— Shubham Vaishnav















