रोज़ ख़ुद से बिछड़ता हूँ मैं
फिर भी तुझ को ही तकता हूँ मैं
इक तुझे देखने के लिए
कितनों से छुपता फिरता हूँ मैं
जब से तू ने लगाया गले
इत्र जैसे महकता हूँ मैं
है सितम क्यूँ उसे देख कर
राह अपनी बदलता हूँ मैं
फूल की सी है क़िस्मत मगर
रोज़ काँटों में पलता हूँ मैं
वो हक़ीक़त में मिलता नहीं
ख़्वाब में जिस से मिलता हूँ मैं
— Vineet Dehlvi















