धुंध में सूरज सी मद्धम मुस्कराती ठंडियाँ
सिंगलों के दुख पे कैसे खिलखिलाती ठंडियाँ
बस इन्हीं दो मौसमों में है कमी खलती तेरी
एक तो बरसात दूजा कपकपाती ठंडियाँ
काशमीरी लाल स्वैटर डाल कर आती थी वो
और जब लगती गले तो हार जाती ठंडियाँ
लाल स्वैटर और वो जकड़न कहाँ, बतलाओ भी
फिर उसी का ज़िक्र कर के दिल जलाती ठंडियाँ
वो जिसे गर्मी में हम गुड-बाय कह कर आए थे
फिर उसी लड़की से रिक्वेस्टें कराती ठंडियाँ
— Vishal Rana














