तिलमिलाते हैं दुआ से दिल-जले अहबाब में

आज कल आते हैं मेरे ज़ाविये सुरख़ाब में

कौन था जो नाम अपना लिख गया दुश्मन नुमा
साथ इक बे-नूर साया है रह-ए-बेताब में

अब उसी वक़्फ़े में ही आ जाए तो कर लू क़बूल
मौत जो ता'मीर होती एक मेरे ख़्वाब में

ज़िंदगी अपनी है काग़ज़ सा सफ़ीना आश्ना
ऐ ख़ुदा तक़दीर कोई डाल जू-ए-आब में

इस किताब-ए-ज़िंदगी का हम ने देखा है असर
सब हक़ीक़त सब हैं अफ़साने नशे नायाब में

— Wasim Jamshedpuri

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