घर के बाहर सभी सियासत रख

शान दस्तार की सलामत रख

अब न इंसाफ़ की उमीदें हैं
जा कहीं और ये अदालत रख

आबरू-ए-वतन जला मत तू
ज़ब्त में आतिशी अदावत रख

जब न दीवार दे सहारा तो
छत किसी हौसले बदौलत रख

कुछ पुराने वक़ार दोस्ती के
मिल मिला कर जहाँ रफ़ाक़त रख

अन-कही बात भी दिखे तुम में
आँख में वो हुनर नज़ाकत रख

गर्म सहरा करे रवा चश्में
आप नेकी पे कुछ अक़ीदत रख

काम ख़ुदगर्ज़ लोग के आ तू
तीरगी पर दिया इनायत रख

आख़िरी जाम से नुमू दुनिया
फिर कहे आज ही क़यामत रख

— Wasim Jamshedpuri

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