जाती नहीं छुपाई में'यार शाइ'रों से
उम्मीद है बहुत ही बेकार शाइ'रों से
कश्ती बदल के खींचे कोई हिजाज़ अपना
है इंक़िलाब बरपा बेदार शाइ'रों से
देखा मजाल हम ने की है न बुज़दिलों में
लर्ज़ा है नफ़रती हर दीवार शाइ'रों से
बरसों रहे पुजारी ग़ुर्बत में दिन है काटे
अब है जदीद मंज़र बाज़ार शाइ'रों से
मदहोश आग दहकी थी जिन पे दिल-लगी की
जल कर वसीम उभरे तय्यार शाइ'रों से
— Wasim Jamshedpuri















