ख़ुद से ही गुफ़्तुगू उम्र-भर तक रही

गुफ़्त की गूँज दिल से नगर तक रही

हम थे लैला के पहलू में तब रात-भर
रात वो जो हयात-ए- बसर तक रही

हम ने ख़ुद को अभी ख़ुद पे खोला नहीं
रहगुज़र की सदा रहगुज़र तक रही

हम में उल्फ़त रफ़ाक़त रही कुछ नहीं
दर्द की आह ख़ून-ए-जिगर तक रही

अब दवा तो दवा थी हमें दर्द दी
लुत्फ़ ही लुत्फ़ हम में असर तक रही

बाग़बानी से तय फ़ाइदा ये हुआ
तुख़्म मिट्टी में तुर्बत शजर तक रही

— Wasim Jamshedpuri

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