"ज़मीर"
कभी कभी ये बेचैनी क्यूँ होती है?
ये सवालों का तूफ़ान कहाँ से आता है?
धड़कने इतनी तेज़ क्यूँ हो जाती हैं?
दिल ज़ोर से मेरा क्यूँ घबराता है
लगता है, सपने बिखर गए सारे
एहसास जम गए, जज़्बात मर गए सारे
एक अजीब-सी ख़ामोशी छा गई
या ज़ोर से कोई चीखता रहा है
या सह
में हुए से बच्चे को कोई
सीने से अपने लगा रहा है
शायद वो मेरा ज़मीर है
वो मुझ से मेरी पहचान पूछता है
जिस बाजार में बेच आया उसे
उस ख़रीदार की दुकान पूछता है
समझ नहीं आता इन सवालों को कैसे रोकूँ?
फिर अचानक एक माजी ज़ेहन में आता है
जो सारी आवाज़ों को शांत कर मेरी ओर देख मुस्कुराता है
जैसे मुझ से कोई उम्मीद लगाए बैठा है















