"चार ज़िंदगी"
सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
माँ का पेट और दुनिया का घर
छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र
पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर
माँ का पेट तुम को आएगा नज़र
नौ महीने जिस ने किया था सब्र
तुम ने दिया क्या उस का अज्र
दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर
जिस
में बसाया तुम ने शहर
थी चार दिन की ज़िंदगी मगर
उस पर लगा दी पूरी उम्र
मिली जब मौत की सब को ख़बर
पछताने लगे फिर हुआ ये असर
अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर
हुआ तैयार जनाज़ा उधर
तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र
होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर
आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर
लगेगा सवालों का एक अंबर
देना जवाब तब ख़ुद के बल पर
जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर
क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र
चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र
जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र
सामने होगा पुल-सिरात सफ़र
तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर
जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र
जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र
जिस ने बनाया नबी को रहबर
जन्नत में होंगे महल और शजर
और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर
न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र
आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र'
जितनी है बाक़ी लगा दीं पर
सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र















