jo ashk barsa rahe hain saahib | जो अश्क बरसा रहे हैं साहिब

  - Ajmal Siraj

जो अश्क बरसा रहे हैं साहिब
ये राएगाँ जा रहे हैं साहिब

यही तग़य्युर तो ज़िंदगी है
अबस घुले जा रहे हैं साहिब

जो हो गया है सो हो गया है
फ़ुज़ूल पछता रहे हैं साहिब

ये सिर्फ़ गिनती के चार दिन हैं
बड़े मज़े आ रहे हैं साहिब

अभी तो ये ख़ाक हो रहेगा
जो जिस्म चमका रहे हैं साहिब

कोई इरादा न कोई जादा
कहाँ किधर जा रहे हैं साहिब

इधर ज़रा ग़ौर से तो देखें
ये फूल मुरझा रहे हैं साहिब

जहाँ की नायाफ़्त के सबब में
जहाँ का ग़म खा रहे हैं साहिब

ये मैं नहीं हूँ ये मेरा दिल है
ये किस को समझा रहे हैं साहिब

सुकून की नींद सोइएगा
वो दिन भी बस आ रहे हैं साहिब

जो आप के हिज्र में मिले हैं
ये दिन गिने जा रहे हैं साहिब

बस अब नहीं कुछ भी याद मुझ को
बस आप याद आ रहे हैं साहिब

  - Ajmal Siraj

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