देख कर मंज़र कई आँसू निकल आए
दोपहर की धूप में जुगनू निकल आए
वो दबाना चाहते हैं एक दो मौज़ू
चाहते हम हैं सभी मौज़ू निकल आए
याद लिखते वक़्त उस की एक दिन आई
फिर हुआ यूँ आँख से आँसू निकल आए
वो सुलाना तो बहाना था फ़क़त उस का
हम इधर सोए उधर बाज़ू निकल आए
आदमी को इक बताया था ख़ुदा उस ने
उस ख़बर के और ही पहलू निकल आए
कोशिशें ये रंग तेरी जल्द ले आए
काश सूखे फूल से ख़ुशबू निकल आए
— AKASH















