AKASH
AKASH
Ghazal

जुदाई का मुझे फिर डर नहीं होता

मुहब्बत में दिवाना गर नहीं होता

मेरी है जान की चिंता उसे बेहद
यूँ ही सिगरेट में फिल्टर नहीं होता

बहुत ही ख़ूब-सूरत आप लगती हैं
बदन पे जब कोई ज़ेवर नहीं होता

मुहब्बत में मुलाज़िम ही बने हैं सब
मुहब्बत में कोई अफ़सर नहीं होता

लड़ूँगा मैं तिरी ख़ातिर ज़माने से
मिरी जाँ हर कोई रघुवर नहीं होता

— AKASH

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