जुदाई का मुझे फिर डर नहीं होता
मुहब्बत में दिवाना गर नहीं होता
मेरी है जान की चिंता उसे बेहद
यूँ ही सिगरेट में फिल्टर नहीं होता
बहुत ही ख़ूब-सूरत आप लगती हैं
बदन पे जब कोई ज़ेवर नहीं होता
मुहब्बत में मुलाज़िम ही बने हैं सब
मुहब्बत में कोई अफ़सर नहीं होता
लड़ूँगा मैं तिरी ख़ातिर ज़माने से
मिरी जाँ हर कोई रघुवर नहीं होता
— AKASH















