उलझनें और बढ़ाते क्यूँ हो
मुझ को हर बात बताते क्यूँ हो
मैं ग़लत लोगों में घिर जाता हूँ
तुम मुझे छोड़ के जाते क्यूँ हो
दिन मिरा काटे नहीं कटता फिर
तुम ज़रा देर को आते क्यूँ हो
मैं नहीं हाथ लगाने वाला
इस क़दर ख़ुद को बचाते क्यूँ हो
ये भी तस्कीन की सूरत है कोई
उस के ख़त सब को दिखाते क्यूँ हो
वादी-ए-गुल से गुज़रते जाओ
हाथ फूलों को लगाते क्यूँ हो
मुझ पे रौशन है हक़ीक़त 'नज़मी'
रोज़ इक ख़्वाब सुनाते क्यूँ हो
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