फिरती है ज़िंदगी जनाज़ा-ब-दोश
बुत भी चुप हैं ख़ुदा भी है ख़ामोश
कोई मेरी तरह जिए तो सही
ज़िंदगी दर-गुलू अजल बर-दोश
दीदनी थी ये काएनात बहुत
हम भी कुछ दिन रहे ख़राब-ए-होश
घर से तौफ़-ए-हरम को निकला था
राह में थी दुकान-ए-बादा-फ़रोश
इक तअ'ल्लुक़ क़दम को राह से है
मैं न आवारा हूँ न ख़ाना-ब-दोश
हम से ग़ाफ़िल नहीं हैं अहल-ए-सितम
इक ज़रा थक के हो गए हैं ख़मोश
जी में है कोई आरज़ू कीजे
या'नी बाक़ी है सर में मस्ती होश
है ये दुनिया बहुत वसीअ' तो हो
मैं हूँ और तेरा हल्का-ए-आग़ोश
दिल को रोते कहाँ तलक 'अख़्तर'
आख़िर-कार हो गए ख़ामोश
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