ये जो आँखों में आब है साहबख़ुद का ये इंतिख़ाब है साहबरोने से मसअले न हल होंगेदेना पड़ता जवाब है साहबग़म से दो चार रोज़ होते हैंअब यही दस्तियाब है साहबसब के होते हैं मसअले लेकिनमुझ पे जैसे अज़ाब है साहब— Aktar ali