ये बात वक़्त से पहले कहाँ समझते हैं

हम इक सराए को अपना मकाँ समझते हैं

यक़ीं किसी को नहीं अपनी बे-सबाती का
सब अपने आप को शाह-ए-ज़माँ समझते हैं

बस इक उड़ान भरी है अभी ख़लाओं तक
इसी को अहल-ए-ज़मीं आसमाँ समझते हैं

हमें भी खींचती है इस की हर कशिश लेकिन
ये ख़ाक-दाँ है इसे ख़ाक-दाँ समझते हैं

ये लोग इतने फ़सुर्दा इसी लिए तो नहीं
कि दूसरों को बहुत शादमाँ समझते हैं

ख़ुदा उन्हें भी हो तौफ़ीक़ इस इबादत की
मोहब्बतों को जो कार-ए-ज़ियाँ समझते हैं

— Alam Khursheed

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Waqt Shayari

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