जो दोनों में जुदाई मरहला है

यही वो इंतिहाई मरहला है

तुम्हारी इंतिहा देखी तो समझा
ये मेरा इब्तिदाई मरहला है

उठा कर उँगलियाँ सब हँस रहे हैं
समझ लो जग-हँसाई मरहला है

बता दो दूध का कोई धुला है
यहाँ अब पारसाई मरहला है

ये मुट्ठी भर ही लश्कर से लड़ेंगे
कि फिर से करबलाई मरहला है

'रज़ी' साँसें मिरी मर्ज़ी नहीं है
क़सम से ये ख़ुदाई मरहला है

— Ali Raza Razi

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Judai Shayari

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