ग़रीबों की कुछ आह-ओ-ज़ारी भी सुनिए
बस अपनी न कहिए हमारी भी सुनिए
सुकूँ दिल का सुनते हैं गर आप साहब
तो दिल की कभी बेक़रारी भी सुनिए
कहीं तन्हा हो जाए तो ख़ौफ़ खाए
है बेबस यहाँ कितनी नारी भी सुनिए
समाजों की सुननी है सच्चाई तो फिर
समाजों की बंदिश ख़ुमारी भी सुनिए
— Ananya Rai Parashar















