सिलवटों से पूछो कितना दर्द बाक़ी
मसला है जिस ने वो कितना मर्द बाक़ी
बह गया है ख़ून कितना इक बशर से
है सनी चादर पड़ी, तन ज़र्द बाक़ी
वो सुहाना जो था मौसम ढल गया है
अब मेरे हिस्से में रातें सर्द बाक़ी
महव बू उस की है यारों हर तरफ़ यूँ
कुछ असर करता नहीं, सर-दर्द बाक़ी
बे-गुनाहों को अज़िय्यत मिल रही है
अब न 'ममता' है कोई हमदर्द बाक़ी
— Mamta 'Anchahi'















