मुझ को कुबरा के बाल बे-मा'नी
हीर का दस्त-माल बे-मा'नी
आज का परशुराम मैं ही हूँ
मेनका की भी चाल बे-मा'नी
बन के चादर वो बिछ गई है कहीं
यार अब तो विसाल बे-मा'नी
मैं इबादतगुज़ार हूँ यारों
उस का अक्स-ए-जमाल बे-मा'नी
यूँ ख़वातीन को वो तकते हैं
जैसे बुर्क़ा-ओ-शाल बे-मा'नी
मौत से मिल रहा सुकूँ सब को
ज़िंदगी का सवाल बे-मा'नी
रूह में दफ़्न हो चुकी 'ममता'
जिस्म का इंतिक़ाल बे-मा'नी
— Mamta 'Anchahi'















