कैसा ये मौसम-ए-जुदाई है
भाई का अब नहीं वो भाई है
कल तलक जान जो छिड़कता था
आज वो लग रहा कसाई है
अब न परवाह उन को इज़्ज़त की
हो रही ख़ूब जग-हँसाई है
दोस्तों की तरह जो मिलते थे
उन के अब दरमियाँ कमाई है
चुभते है ज़ख़्म जो पुराने वो
भूल जाने में ही भलाई है
चालबाज़ी नहीं नज़र आती
आग ये गै़रों की लगाई है
कैसे 'ममता' मैं उन को समझाऊँ
बंद मुट्ठी में बादशाई है
— Mamta 'Anchahi'















