मेरी मौत पर शामियाने लगे हैं
सो क़व्वाल भी आज गाने लगे हैं
जिबिल्लत से लगता था जिन को निकम्मा
वो तौक़ीर में गुनगुनाने लगे हैं
सवालों के घेरे में रक्खा था मुझ को
पर अब फ़ातिहा पढ़ने आने लगे हैं
मैं हूँ अब पियारा मेरे दुश्मनों को
जनाज़े में उन के भी शाने लगे हैं
जो शहवत-परस्ती में बरसों रहे गुम
मुझे पीर कह के बुलाने लगे हैं
यूँ मातम-नशीं अपने ग़म बाँट के याँ
बची रस्मों को भी निभाने लगे हैं
मुक़द्दस की मय्यत पे चढ़ कर के 'ममता'
गुल-ए-तर भी आँसू बहाने लगे हैं
— Mamta 'Anchahi'















