दिल वज़ीरी से इक खिलाड़ी है
लगता है लगने दो अनाड़ी है
जाके बाज़ार से ख़रीदा ग़म
यार कहते हैं तू कबाड़ी है
रेज़ा रेज़ा नज़र से कर डाला
आबरू द्रौपदी की साड़ी है
मुंतहा-ए-कमाल से आगे
कोई मंज़िल न कोई गाड़ी है
राह तकने में जो पहाड़ हुआ
वो अगाड़ी है, न पछाड़ी है
यूँ ही बदनाम ये छिछोरें हैं
पैसे ने ज़िंदगी बिगाड़ी है
दौड़ती है यहाँ पे महँगाई
तेज़ काँ चलती रेल गाड़ी है
— Mamta 'Anchahi'















