जो मेरा था आज देखो वो पराया हो गया

उस के भी ईमान का यारों है सौदा हो गया

मो'जिज़ा ही लगता है उस का बिछड़ जाना मुझे
दुख तो है, क्यूँ शहर में है ज़िक्र इस का हो गया

उन से ताबे'दारी होती ये कहाँ मुमकिन था जान
इक दफ़ा छूने से है दुश्मन चहीता हो गया

मामला संगीन था कुछ भी समझ पाई नहीं
वो फ़रेबी निकला तब माना के अच्छा हो गया

वो फ़रेबी था ये सच कब तक छुपा रहता कहो
है मगर अफ़सोस मेरा वक़्त ज़ाया' हो गया

टूट कर हाथों से उस के ग़म नहीं होता मुझे
ये तो होना ही था इक दिन, फिर भी हव्वा हो गया

उस का जब भी नाम लिक्खा और मिटाया है कभी
देख के तहरीर, आँखों में है छाला हो गया

— Mamta 'Anchahi'

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