था बसाया दिल में हर लम्हात को
कोसता मैं रह गया हालात को
एक सी है रत-जगों की ज़िंदगी
चाँद मुझ से कह रहा था रात को
मैं तो समझा हूँ तुम्हारी बात सब
तुम भी तो समझो ना मेरी बात को
हूँ बराबर इश्क़ के इस खेल में
मानता हूँ जीत अपनी मात को
तोड़ना ही है सभी का दिल तुझे
मैं न समझा तेरे इस जज़्बात को
— Ankit Dixit















