उठा हैं दिल में सौ दफ़ा ख़याल उस मलाल का
मैं रोज़ रात सोचता वो इश्क़ था कमाल का
हथेलियाँ निहारते वो वक़्त भी गुज़ार दी
मिला था इत्तिफ़ाक़ से जो पल मुझे विसाल का
उसे न कुछ कहे कोई जो इश्क़ ले मेरी ये जान
क़सूर हो तो सिर्फ़ मेरे ख़ून के उबाल का
सितम जो भी मिला मुझे लिखा था वो नसीब में
किसी से क्यूँ गिला करें हम इस दिल-ए-निढाल का
उसे भी कुछ दिखा नहीं मैं ने भी सिर्फ़ लिख दिया
जो हाल मेरे दिल का था जो हाल था रुमाल का
बिठा के तुम को इक जगह निहारना है बस मुझे
हैं देखना कि क्या कोई हैं अंत इस जमाल का
ये पूछना था अर्ज़ को जो ज़ेहन में सवाल हैं
उठा ले फ़ोन और फिर जवाब दे सवाल का















