माना बहुत ही ख़ूब है मंज़िल वहाँ की पर
उस राह से गुज़र के लहू क्यूँ करूँँ जिगर
रफ़्तार तो बहुत है मगर दौड़ता नहीं
ले कर के इक चराग़,है करना मुझे सफ़र
ये रेल भी कहाँ यूँँ ही चलती रहेगी यार
तुम भी बिछड़ ही जाओगे अगले पड़ाव पर
ये रास्ते न कम मुझे पड़ने लगे कहीं
ये सोच कर भी मैं नहीं होता हूँ दर ब दर
मालूम है कि फ़र्क़ तो पड़ता नहीं उसे
मैं रो पड़ा हूँ हाल बताते हुए मगर
अपना समझ के छोड़ दिया इक हुजूम ने
हाथों में मेरे दूर से पत्थर को देख कर
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