दम ब दम, दम ही निकलता जा रहा है

क्यूँ मुझे तू याद इतना आ रहा है

तू जिसे मंज़िल समझ कर मुतमईं है
वो मेरी ख़ातिर फ़क़त रस्ता रहा है

ये बयाँ चहरे से उस के हो रहा है
वो मुझे खो कर बहुत पछता रहा है

सामने मेरे बिका वो कौड़ियों में
जो ज़माने में बहुत महँगा रहा है

मैं उसे मंज़िल समझता ही नहीं हूँ
तू जहाँ जा कर बहुत इतरा रहा है

उस की आँखों से पिया था एक क़तरा
उम्र भर उस का मुझे नश्शा रहा है

है पता मुझ को वो सब पहले से 'जस्सर'
जो मुझे कहने से वो घबरा रहा है

— Avtar Singh Jasser

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Raasta Shayari

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