तक़ाज़े हैं शायद यही आज-कल के
बहारों में रख दें गुलों को मसल के
मिरी तल्ख़ थी मुस्कुराहट कुछ ऐसी
ग़म-ए-ज़िंदगी रह गया हाथ मल के
हमें क्या डराते हो मिटने के डर से
ज़माना न रख दे तुम्हें ख़ुद कुचल के
फ़ज़ा में ये धीमी सी आहट है कैसी
सबा है कि उन के क़दम हल्के हल्के
ये दिल है शिकस्ता उमीदों की बस्ती
यहाँ आइएगा सँभल के सँभल के
अजब है ये दुनिया अजब उस की रस्में
कहीं पर उजाले कहीं पर धुँदलके
न की मैं ने तक़लीद-ए-शैख़-ओ-बरहमन
ख़ुदा मिल गया इस भँवर से निकल के
सुना है बहिश्त-ए-ज़मीं मै-कदा है
चलो 'ताहिरा' देख लें क्यूँ न चल के
— Bano Tahira Sayeed















