ye jo khwaabon ka chaska lag raha hai | ये जो ख़्वाबों का चसका लग रहा है

  - Dipak Prajapati Khaalis

ये जो ख़्वाबों का चसका लग रहा है
फ़क़त नींदों का धोका लग रहा है

दुआ जीने की सब देने लगे हैं
मुझे मरने का ख़तरा लग रहा है

तुम्हारा ही करम है मिरे दर्द
जो मेरा शेर पुख़्ता लग रहा है

मुझे जब से लगा है नश्शा-ए-ग़म
मुझे हर नश्शा हल्का लग रहा है

मगर ये मैं नहीं हूँ आइने में
ये कोई है जो मुझ सा लग रहा है

मिरी कश्ती में कोई छेद कर दो
मुझे दरिया निहत्था लग रहा है

कहाँ पे फँस गया हूँ मैं भी आ कर
ये जिस्म इक बंद कमरा लग रहा है

  - Dipak Prajapati Khaalis

Aadat Shayari

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    Dipak Prajapati Khaalis
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    Dipak Prajapati Khaalis
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    Dipak Prajapati Khaalis
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    ये कर्ब-ओ-दर्द ही दर-अस्ल है दरकार जीने में
    सो इन को चाहिए दिन-रात पलकों पे सजा रखना

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    कोई भी सानेहा गुज़रे मगर चेहरा खुला रखना

    अमीर-ए-शहर के लोगों में इक ये भी रिवायत है
    बहुत मैला बदन रखना बहुत उजली क़बा रखना

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