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फिर वही रात जो तन्हाई के आग़ोश रही  - Divya Jain

फिर वही रात जो तन्हाई के आग़ोश रही
इक उनीदी सी ग़ज़ल ख़्वाब में मदहोश रही

हम से वो अजनबी और उन से थे अनजाने हम
ता-अबद यूँ ही मोहब्बत ये फ़रामोश रही

पर्दा-ए-चश्म में यादों के ज़ख़ीरे पुर-शोर
झाँकती उन से जो तन्हाई वो ख़ामोश रही

जब तलक पहुँची न वो महफ़िलों से महफ़िलों में
तब तलक मेरी वो रुस्वाई भी पुर-जोश रही

क्यूँ हो शर्मिंदा वो इंसाँ के जराएम पर यूँ
क्यूँ ज़मीं शब की सियाही में रिदा-पोश रही

आँख पे छाए हैं अरमान जो थे ज़ेर-ए-दिल
दास्ताँ हर यहाँ हो के धुआँ रू-पोश रही

बात फिसली थी जो कानों में ज़बाँ से लटकी
तौक़ बन के वो ही ता-उम्र सर-ए-दोश रही

Divya Jain
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