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ले के परचम मिरे दामन का खड़े हैं सारे  - Divya Jain

ले के परचम मिरे दामन का खड़े हैं सारे
आ के फिर जिस्म पे पत्थर ये पड़े हैं सारे

दफ़्न करने की है इंसाँ को ज़रूरत अब क्या
शर्म से ख़ुद में ही ख़ुद से तो गड़े हैं सारे

ज़ीस्त की राह को अब अपनी बनाना तू मिसाल
हैं पशेमान जो मंज़िल पे खड़े हैं सारे

कितनी पर्वाज़ भरो अपना न आग़ाज़ तजो
पर बिखर के तो ज़मीं पर ही पड़े हैं सारे

बदला है सारा जहाँ बदली न क़ौम-ए-आशिक़
इन को समझाइए क्या चिकने घड़े हैं सारे

उम्र तो सारी गँवाई हो न पाए इंसाँ
पर ख़ुदा बनने को फिर भी तो अड़े हैं सारे

ख़ुद को कर ख़त्म ही करते हैं वो आग़ाज़ नया
पत्ते वो ज़र्द जो शाख़ों से झड़े हैं सारे

Divya Jain
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