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उम्र गुज़री है सहारे नहीं बदले मैं ने  - Diya Jeem

उम्र गुज़री है सहारे नहीं बदले मैं ने
जो पियारे हैं वो प्यारे नहीं बदले मैं ने

वही आकाश वही रात की चादर सर पर
चाँद को देख के तारे नहीं बदले मैं ने

नीले पीले से ये लम्हात हैं जागीर मिरी
हिज्र में अपने इशारे नहीं बदले मैं ने

मुद्दतों बाद तिरी याद के मैले कपड़े
कुछ बदल भी दिए सारे नहीं बदले मैं ने

मैं नदी थी तो मिरे साथ किनारा तू था
साथ बहती रही धारे नहीं बदले मैं ने

ख़्वाब को सुब्ह की दहलीज़ पे ले आई हूँ
आँख खोली है नज़ारे नहीं बदले मैं ने

तेरे ख़्वाबों से ही रौशन रहा ये दिल का 'दिया'
हिज्र में ख़्वाब तुम्हारे नहीं बदले मैं ने

Diya Jeem
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